Vivek Oberoi: बरसों के अँधेरे से निकल कर एक नए सूरज की ओर

Vivek Oberoi: बरसों के अँधेरे से निकल कर एक नए सूरज की ओर

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का हमारे ब्लॉग द खबरीवाला में आज के “इस ब्लॉग में आज हम बात करेंगे बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता विवेक ओबेरॉय की ज़िंदगी, फिल्मों और उनके सफर के बारे में।”

जब Vivek Oberoi ने फिल्मों में प्रवेश किया, लोग उन्हें बॉलीवुड की तेज उभरती हुई प्रतिभा मानते थे। Company, Saathiya, Yuva जैसे फ़िल्मों में उन्होंने वह अभिनय किया कि नाम ही नहीं, तारीफ़ भी मिली। लेकिन वक्त ने रास्ता आसान न रखा।

एक अफेयर, एक विवादित प्रेस कॉन्फ्रेंस- ये मोड़ उनके करियर के लिए मुश्किल साबित हुए। प्रोड्यूसर‑निर्देशक उनके नाम पर भरोसा करने लगे कि तस्वीरें बदल चुकी हैं; बड़े रोल मिलना बंद हो गए। वो दिन भी आए जब फिल्मों से ऑफर नहीं आते थे, और वह खुद कहते हैं कि “Income from movies dried up” जब प्रसिद्धि कम हो जाए, तो जीवन आसान नहीं रहता। मनोबल नहीं टूटा, राह नहीं छोड़ी

लेकिन Vivek ने हार नहीं मानी। ज़िंदगी उस मोड़ पर खड़ी हो गई थी जहाँ सारे दरवाजे बंद लगते थे, लेकिन उन्होंने खुद को झुकने नहीं दिया। बचपन से ही उनके पिता, Suresh Oberoi, उन्हें सिखाते आए कि आत्म‑निर्भर होना ज़रूरी है। बचपन में छोटे‑छोटे बिज़नेस, उत्पाद बेचने, निवेश की समझ  ये सब अनुभव उन्हें आगे का रास्ता दिखाने लगे।

फिल्मों से जो ब्रांड और पहचान मिली थी, उसने उन्हें एक मजबूत नींव दी। लेकिन सफल फिल्मों की कमी, लाबियों और उन दबावों से निराशा भी हुई। यही वह बिंदु था, जब उन्होंने निर्णय लिया कि अब सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि बिज़नेस भी उनका ज़रिया होगा।

बिज़नेस और नई पहचान

पिछले कुछ वर्षों में Vivek Oberoi ने कदम‑कदम पर रणनीति बनाई: बहु‑गुणी कंपनियाँ  उन्होंने अनेक तरह के बिज़नेस में हाथ आज़माया: रियल एस्टेट, ज्वेलरी, प्रौद्योगिकी आदि। उन्होंने अपनी लगभग 12 कंपनियों के लिए पिछले एक साल में लगभग ₹8,500 करोड़ का निवेश जुटाया है। दो कंपनियाँ IPO की तैयारी में हैं। आर्थिक स्वतंत्रता  उन्होंने बताया है कि बिज़नेस ने उन्हें वह आज़ादी दी है कि अब उन्हें फिल्मों के लिए सिर्फ ऑफ़र आने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता, बल्कि वही प्रोजेक्ट चुन सकते हैं जो उन्हें पसंद हों।

संघर्ष से मिली सीखी हुई चीज़ें

उनके सफर में सिर्फ पैसे कमाना नहीं था बल्कि कई तरह की पीड़ा, उम्मीद, टूटने‑संवारने की रातें थीं जब फिल्में नहीं बनतीं, या रोल कम मिलते थे, तब आत्म‑सम्मान के सवाल उठते थे। आलोचनाएँ होती थीं “क्यों नहीं कर पा रहे?”, “पुरानी फिल्मी छवि ही काम आ सकती थी!” लेकिन हर आलोचना ने उन्हें मजबूत बनाया। परिवार और उन लोगों का सहारा, जो उनकी अच्छाई देखते रहे, उन्हें गिरने से बचाते रहे।

नया युग, नई सोच आज Vivek Oberoi सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि एक उद्यमी, निवेशक और सोशल प्रैक्टिशनर बन चुके हैं उन्होंने यह देखा कि Silicon Valley की टेक्नोलॉजी और Marwari‑परंपरा की व्यावसायिक सूझ‑बूझ मिलाकर कुछ बड़ा किया जा सकता है। उनकी कंपनीज़ अनेक क्षेत्रों में काम कर रही हैं, और नए आईपीओ के माध्यम से बड़े निवेशक भी उनसे जुड़ रहे हैं। अब उन्हें निम्न‑स्तर के रोल या अधूरी पहचान नहीं सहनी पड़ती, क्योंकि बिज़नेस ने उन्हें आत्मविश्वास दिया है।

हम सब के लिए सबक- Vivek की कहानी हमें ये सिखाती है:

1. पहचाने गए हुए जलते हैं, लेकिन जिनकी जिजीविषा ज़्यादा हो, वो फिर से उभरते हैं।

2. स्वाभिमान और आत्म‑निर्भरता इंसान को दबाव से बाहर निकालती है।

3. परिवर्तन को स्वीकार करना जब एक रास्ता बंद हो जाए, दूसरा रास्ता खोज लेना ही बुद्धिमत्ता है।

4. धैर्य और संघर्ष — रातें लंबी हों, दिन छोटे हों, लेकिन उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

वक्त कभी किसी के लिए स्थिर नहीं रहता है। विवेक ओबेरॉय की ज़िंदगी इस बात का जीता जागता प्रमाण है कि किस तरह एक व्यक्ति अपने अतीत की गलतियों या विवादों से माफी नहीं मांग कर, बल्कि अपने आप को सुधार कर और नए नजरिए से काम कर के भी सफलता हासिल कर सकता है।

जहाँ एक दौर था कि उनके नाम पर हँसी होती थी, आज वही नाम बड़े निवेशकों को आकर्षित कर रहा है, और वही व्यक्ति दूसरों को काम दे रहा है, नए मौके पैदा कर रहा है। उनकी कहानी यह दिखाती है कि किस्मत को पलटने में देर नहीं लगती!

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