आखिर कब है धनतेरस

आखिर कब है धनतेरस-  हर साल कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को जब मौसम में हल्की ठंडक दस्तक देती है, आकाश में पतंगें नहीं, पर दीपों की आभा चमकने लगती है, तब आता है एक विशेष दिन धनतेरस। यही दिन दीपावली की शुरुआत करता है, जब घर-आंगन से लेकर दिलों तक रोशनी की पहली किरण उतरती है।

धनतेरस केवल एक खरीदारी का दिन नहीं है, यह शुभता का प्रवेश द्वार है। यह वह दिन है जब हम न केवल घर में कुछ नया लेकर आते हैं, बल्कि अपने जीवन में भी संपन्नता, स्वास्थ्य और सौभाग्य की ऊर्जा को आमंत्रित करते हैं।

धनतेरस का आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व- धार्मिक मान्यता के अनुसार, त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे। वे आयुर्वेद के जनक माने जाते हैं और स्वास्थ्य के देवता कहलाते हैं। इसलिए इस दिन को “धन” (स्वास्थ्य और वैभव) और “तेरस” (त्रयोदशी) के पावन मेल के रूप में देखा जाता है। साथ ही, कुबेर देव जो देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं, उनका भी इस दिन विशेष पूजन किया जाता है। और माता लक्ष्मी, जो धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी हैं उनका आगमन भी इन्हीं पांच दिवसीय उत्सवों में होता है।

धनतेरस पर इन तीनों – धन्वंतरि, कुबेर और लक्ष्मी – की आराधना कर हम जीवन में सुख, समृद्धि और निरोगता की कामना करते हैं।

खरीदारी का शुभ योग: क्यों खरीदी जाती हैं कीमती वस्तुएं?- धनतेरस पर सोना, चांदी, बर्तन, और नई चीजें खरीदने की परंपरा है। कहा जाता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तु जीवन में 13 गुना वृद्धि करती है – यह सिर्फ एक विश्वास नहीं, बल्कि एक उम्मीद की लौ है। जब हम नया बर्तन खरीदते हैं, तो उसमें केवल धातु नहीं, बल्कि आशा और संकल्प भरते हैं कि आने वाला साल खुशियों से परिपूर्ण होगा।

आजकल लोग धनतेरस पर: सोने-चांदी के सिक्के, स्टील/पीतल/तांबे के बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुएं, वाहन या प्रॉपर्टी या कम से कम मिट्टी के दीये खरीदते हैं। बात केवल चीज की नहीं है बात उस भावना की है जो कहती है “शुभ की शुरुआत शुभ से ही होनी चाहिए।”

धनतेरस पूजा विधि: कैसे करें भगवान धन्वंतरि और लक्ष्मी-कुबेर की आराधना? धनतेरस की शाम दीप जलाकर पूजा की जाती है। पूजा विधि सरल, पर भावपूर्ण होती है:

  • 1. सबसे पहले घर और आंगन की सफाई करके तुलसी चौरे और घर के द्वार पर दीपक जलाएं।
  • 2. पूजा स्थान पर भगवान धन्वंतरि, कुबेर और लक्ष्मी जी की मूर्तियां या चित्र स्थापित करें।
  • 3. उन्हें फूल, दीप, धूप, चंदन, नैवेद्य और मिठाइयों का भोग अर्पित करें।
  • 4. कुबेर मंत्र, लक्ष्मी स्तोत्र और धन्वंतरि मंत्र का जाप करें।
  • 5. इसके बाद पूरे घर में दीप जलाकर अंधकार पर रोशनी की विजय का आह्वान करें।

मानवीय भाव: धनतेरस क्यों है दिल से जुड़ा हुआ?- धनतेरस की असली सुंदरता इसकी भावनात्मक गहराई में छुपी है। जब मां कहती है, “आज कुछ अच्छा खरीदना है”, तो उसमें एक विश्वास होता है कि परिवार तरक्की करेगा। जब पिता एक नया बर्तन लाकर दरवाजे पर रख देते हैं, तो उसमें साल भर की मेहनत और दुआ छुपी होती है। जब बच्चे नए दीये सजाते हैं, तो वह केवल दीप नहीं जलाते, बल्कि घर की खुशियों का पहला पन्ना खोलते हैं। इस दिन हर घर में एक उम्मीद का दीया जलता है कि आने वाला साल खुशियों से भरा हो, परिवार स्वस्थ रहे, और जीवन में रौशनी कभी कम न हो।

धनतेरस का आधुनिक रूप- आज के दौर में जब सब कुछ डिजिटल हो गया है, तब भी धनतेरस की चमक फीकी नहीं पड़ी है। अब लोग ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं, पर उस भाव में कोई कमी नहीं आई। ऑफिसों में धनतेरस बोनस, बाजारों में भारी डिस्काउंट्स, और सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़ सब मिलकर इस त्योहार को एक सामूहिक उत्सव बना देते हैं।

अंत में… धनतेरस केवल धन का नहीं, बल्कि “धन्य” होने का उत्सव है। यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि संपत्ति केवल धन या सामान में नहीं, बल्कि रिश्तों, स्वास्थ्य और संतोष में भी होती है। तो इस धनतेरस, कुछ नया जरूर खरीदिए लेकिन साथ में प्रेम, कृतज्ञता और आशा का दीप भी अपने दिल में जलाइए।

शुभ धनतेरस!
आपका जीवन रोशनी, समृद्धि और स्वस्थता से भरपूर हो।

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