भोजपुरी इंडस्ट्री में महाभारत! खेसारी लाल यादव ने पवन सिंह पर बोला तीखा हमला

भोजपुरी इंडस्ट्री में महाभारत! खेसारी लाल यादव ने पवन सिंह पर बोला तीखा हमला -“मैं थूक कर चाटने वालों में से नहीं हूं!”

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भोजपुरी सिनेमा के दो सबसे बड़े सुपरस्टार्स -खेसारी लाल यादव और पवन सिंह अब आमने-सामने हैं। इनकी आपसी तनातनी कोई नई बात नहीं, लेकिन अब जो बयान सामने आया है, वो सीधे-सीधे आत्मसम्मान, राजनीति और व्यक्तिगत विचारधारा को लेकर है। और ये विवाद अब सिर्फ “स्टारडम” तक सीमित नहीं रहा  यह सम्मान, सिद्धांत और समाज में छवि से जुड़ चुका है।

खेसारी का तीखा बयान: “थूक कर चाटने वालों में से नहीं हूं!” हाल ही में एक मीडिया बातचीत या मंच पर खेसारी लाल यादव ने पवन सिंह पर निशाना साधते हुए कहा “पहले ये RK सिंह से माफ़ी मांगे, फिर उपेंद्र कुशवाहा से माफ़ी मांगे,

उनके पैर पकड़ें… बीजेपी ने इनसे सबका माफ़ीनामा करवाया, तब जाकर इनकी अमित शाह से मुलाक़ात हुई। भाई साहब, मैं इतना थूक कर चाटने वाला इंसान नहीं हूं। “ये बयान किसी सामान्य विवाद का हिस्सा नहीं, बल्कि सीधा-सीधा पवन सिंह के राजनीतिक रुख और आत्मसम्मान से समझौते की ओर इशारा करता है।

 

भोजपुरी इंडस्ट्री: जहां स्टारडम के साथ आती है राजनीतिक तनातनी भोजपुरी सिनेमा सिर्फ गानों और मसालेदार डायलॉग्स तक सीमित नहीं रहा। अब यह राजनीति का भी बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। बड़े-बड़े नेता भोजपुरी कलाकारों के ज़रिए जनता तक अपनी बात पहुंचाने लगे हैं। पवन सिंह ने हाल ही में जिस तरह भाजपा में सक्रियता दिखाई और अमित शाह से मुलाक़ात की उसी पर खेसारी का यह तंज था।

क्या पवन सिंह ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए आत्मसम्मान से समझौता किया? या खेसारी लाल यादव खुद को उस स्तर से ऊपर मानते हैं जहाँ “समझौता” शब्द उनकी ज़िंदगी में जगह नहीं रखता?

 

दूसरी तरफ क्या कहता है पवन सिंह का पक्ष?- अब तक पवन सिंह की तरफ से इस पर कोई सीधा जवाब सामने नहीं आया है। लेकिन यह कहना ग़लत नहीं होगा कि खेसारी के इस बयान ने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है।

जहां एक तरफ दोनों के फैंस सोशल मीडिया पर भिड़े हुए हैं वहीं कुछ लोग इसे पब्लिसिटी स्टंट भी मान रहे हैं।

 

“थूक कर चाटना” – एक लाइन, जो बहुत कुछ कह गई खेसारी का यह कहना कि “मैं थूक कर चाटने वालों में नहीं हूं”, ये केवल एक लाइन नहीं  यह उनके व्यक्तित्व, सोच और सिद्धांत की झलक है। वो यह जताना चाहते हैं कि चाहे जितनी भी ऊंचाई मिल जाए, अगर आत्मसम्मान गिर जाए तो सफलता भी बेमानी है।

आखिर में सवाल यही है…क्या यह विवाद वाकई निजी है या राजनीतिक? क्या पवन सिंह खामोशी से जवाब देंगे या फिर एक और मोर्चा खुलेगा?

और सबसे बड़ा सवाल क्या भोजपुरी सिनेमा अब कलाकारों की कला से ज़्यादा उनकी पार्टियों और विचारधाराओं से पहचाना जाएगा? ये सिर्फ एक झगड़ा नहीं, बल्कि पहचान, प्रतिष्ठा और पॉलिटिक्स का संग्राम है। जो भी हो, भोजपुरी सिनेमा के दर्शकों के लिए यह सिर्फ एक मनोरंजन का मसला नहीं बल्कि उनके हीरो की असली सोच जानने का मौका भी है।

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