जीएसटी पर बयान ने सियासत गरमाई – काजल निषाद का रवि किशन पर तीखा तंज
उत्तर प्रदेश की राजनीति फिर से बहस और कटाक्षों के बीच फंस गई है। केंद्रीय नेता रवि किशन द्वारा जीएसटी से जुड़ा दिया गया बयान अचानक चर्चा का विषय बन गया और समाजवादी पार्टी की नेत्री काजल निषाद ने उस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। मामला सिर्फ कर दरों या अर्थनीति का नहीं रहा बन जा रहा है शब्दों की टकराहट और निजी तंज का युद्ध।
रवि किशन ने एक सार्वजनिक बयान में जीएसटी सुधारों के सकारात्मक असर की ओर इशारा करते हुए कुछ वस्तुओं के दाम घटने का उदाहरण दिया। उन्होंने कुछ संख्या-उद्धरण देकर बताया कि किस तरह चीजें सस्ती हो रही हैं। यह बात विपक्ष के लिए भुनाने का मौका बन गई। काजल निषाद ने न केवल उस दावे को खारिज किया बल्कि उसे मजाकिया और अपमानजनक अंदाज में टारगेट भी किया -उनके व्यंग्य ने बातचीत का मूड बदल दिया। उन्होंने कहा कि सांसद का यह “गणित” अनौठा है और ऐसे में वे (काजल के शब्दों में) तंज कसती हुईं कहती दिखीं कि “लगता है सांसद जी सस्ता नशा कर रहे हैं।”
काजल ने बयान को सिर्फ मजेदार टिप्पणी तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि हाल के महीनों में बड़ी मात्रा में गांजे की खेपें आई हैं और तंज के साथ कहा कि संसद सदस्य खुद उस “सस्ती खेप” के प्रभाव में हैं। यह आरोप जितना तीखा है, उतना ही संवेदनशील भी है – क्योंकि सार्वजनिक व्यक्तियों पर नशीले पदार्थों के दुरुपयोग के आरोप सीधे संवेदनशील नैतिक और कानूनी मुद्दों को छूते हैं। विपक्ष और सत्तारूढ़ दल दोनों के समर्थक अब सोशल मीडिया और स्थानीय बैठकों में इस पर अपनी-अपनी व्याख्या दे रहे हैं।
इस पूरा वार्तालाप दो बड़ी बातें उजागर करता है। पहली, जीएसटी और कर सुधार जैसे तकनीकी विषय राजनीति में कैसे भावनात्मक हो जाते हैं – जब किसी नेता इन्हें लोकप्रियता दिखाने के लिए साधारण उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करता है, तो विपक्ष उस पर तंज कसकर संविधानिक, कानूनी या नैतिक सवाल उठा देता है। दूसरी, आज की राजनीतिक बहसों में तथ्य-आधारित चर्चा अक्सर व्यंग्य और व्यक्तिगत आरोपों से दब जाती है। जनता के सामने आर्थिक नीतियों का लाभ-नुकसान या उनके वास्तविक प्रभावों पर खुलकर चर्चा कम और निजी हमले अधिक दिखते हैं।
स्थानीय स्तर पर यह टकराव वोटरों के बीच भी चिंताएं पैदा कर रहा है। एक ओर कुछ लोग जीएसटी के फायदों पर विश्वास पैदा करने वाले बयानों का स्वागत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे कटाक्ष और आरोप राजनीतिक संस्कृति पर सवाल खड़े करते हैं। नागरिक यही देखना चाह रहे हैं कि मुद्दे का हल चर्चा और सबूतों के आधार पर निकले – न कि केवल मजाक और आरोप-प्रत्यारोप से।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इस तरह के वार अक्सर चुनावी मौसम से पहले तेज होते हैं – क्योंकि नेता छोटे-छोटे मुद्दों को बढ़ाकर अपना जनाधार मजबूत करने की कोशिश करते हैं। इस बार भी लग रहा है कि बयान और जवाब ने वोटर्स का ध्यान आर्थिक विमर्श से हटा कर व्यक्तिगत विवादों पर मोड़ दिया है। इससे वास्तविक समस्याएँ महंगाई, रोजगार, स्थानीय विकास पीछे छूट सकती हैं।
अंत में, यह जरूरी है कि सार्वजनिक बहस में संयम और तथ्य का स्थान बना रहे। किसी भी नीति के प्रभाव को समझना हो तो आंकड़े, विशेषज्ञ राय और जमीन पर अनुभव ज़्यादा मायने रखते हैं न कि केवल तंज और बयानबाज़ी। काजल निषाद और रवि किशन के बीच की यह बदनामी भरे तकरार शायद अस्थायी उबाल है, पर इससे एक बड़ा संदेश मिलता है: राजनीतिक संवाद को अगर स्वस्थ रखना है तो व्यक्तिगत आरोपों से ऊपर उठकर मुद्दों की गंभीर पड़ताल करनी होगी।