सिंगापुर vs इंडिया: एक ड्रॉ जिसने उम्मीदों को जिंदा रखा

सिंगापुर vs इंडिया: एक ड्रॉ जिसने उम्मीदों को जिंदा रखा

दिनांक: 9 अक्टूबर 2025
स्थान: सिंगापुर नेशनल स्टेडियम
प्रतियोगिता: AFC एशियन कप 2027 क्वालीफिकेशन, ग्रुप C

ऐसी शुरुआत कि दिल थम जाए मैच की शुरुआत में ही सिंगापुर ने दिखाई कि यहाँ आसानी से नहीं हारने वाले हैं। पहले हाफ के स्टॉपेज टाइम में यह हुआ कि अति महत्वपूर्ण बचाव‑गलती से भारत को गोल सुनना पड़ा। इखसान फंदी ने यह मौका भुनाया, भारत की डिफेंस थोड़ी ढीली पड़ी और गेंद उनके पैरों से निकल गई।

भारत की टीम पर दबाव था – उनके लिए हर पॉइंट मायने रखता था, हर मिनट एक परीक्षा थी। लेकिन सिंगापुर के हमले, उनकी गेंद‑मालिकाना हिस्सेदारी, सब कुछ ऐसा लग रहा था कि शायद भारत पिछड़ जाएगा।

 

मुश्किल की घड़ी: जब मैदान पर भारत 11 नहीं, 10 था

दूसरे हाफ की शुरुआत एक ऐसे मोड़ से हुई, जो किसी भी टीम के लिए सबसे भारी पल होता है। संदीश झीगन, भारतीय डिफेंस की रीढ़, दो येलो कार्ड्स के चलते रेड कार्ड झेल बैठे और भारत मैदान पर रह गया 10 खिलाड़ियों के साथ।इस एक फैसले ने मैच की पूरी दिशा बदल दी। अब भारत को सिर्फ खेलना नहीं था, जूनून के साथ जूझना भी था। सिंगापुर ने मौके को बखूबी भांपा  पासिंग, पोजेशन, और लगातार अटैक। लेकिन भारत ने हार मानने की बजाय दीवार बन जाना चुना। हर खिलाड़ी ने एक कदम और दौड़ा, एक ब्लॉक और किया, एक सांस और रोकी  क्योंकि अब बात सिर्फ फुटबॉल की नहीं थी, इज्ज़त और इरादे की थी।

 

अंतिम क्षणों की चिंगारी: जब रहीम ने उम्मीदें फिर से जगा दीं

मैच की घड़ी 90वें मिनट को छू रही थी। थके शरीर, धीमे कदम, और एक गोल से पीछे चल रही टीम इंडिया -लेकिन दिल अब भी धड़क रहा था, हार मानने से इनकार कर रहा था। और तभी आया वो लम्हा  सिंगापुर की डिफेंस ने एक मामूली सी चूक की, जॉर्डन इमाविवे का बैकपास इतना ढीला था कि रहीम अली ने जैसे बिजली की रफ्तार से उसे लपक लिया। एक झलक, एक टच, और फिर… गोल। ना सिर्फ बराबरी का स्कोर, बल्कि पूरे भारत के लिए एक साँस राहत की। ये सिर्फ बराबरी नहीं थी  ये एक बयान था, कि “हम आखिरी सीटी तक लड़ेंगे।”

रहीम का यह गोल क्वालीफिकेशन की दौड़ में एक कीमती बिंदु लेकर आया  और उससे भी कीमती, वो जज़्बा, जो अब इस टीम के अंदर साफ दिख रहा है।

भावनाएँ, चुनौतियाँ और उम्मीदें

चुनौती: 10 खिलाड़ियों के साथ खेलना आसान नहीं है, सिंगापुर जैसा टीम जब दबाव में आए, तो कई मौके बनाए, लेकिन तवज्जो और सहनशीलता की कमी ने उन्हें चूकने पर मजबूर किया। भारत का मनोबल: हार के मुंह से एक बिंदु निकालना, मतलब अभी पूरी तरह से हार नहीं मानी गई। यह दिखाता है कि टीम में आत्म‑विश्वास है, लड़ने की क्षमता है। कोच की भूमिका: बदलती स्थिति में खिलाड़ियों को सही भूमिका देना, substitutions करना, रणनीति में बदलाव लाना  ये सब मायने रखे। हार्ड‑कॉर मुकाबला था, और खिलाड़ियों ने दिखाया कि जब ज़रूरत हो, तो समर्पण कितना ज़रूरी है।

“ड्रॉ से हार नहीं होती”-इस मुकाबले का स्कोरलाइन 1‑1 रहा। पर यह ड्रॉ सिर्फ संख्या नहीं, एक कहानी है  वो कहानी जो कहती है कि: अभी खत्म नहीं हुआ है, उम्मीदें बनी हुई हैं। भारत ने खुद को साबित कर दिया कि दबाव में भी गिरने की बजाय उठ सकते हैं। अगली चुनौतियाँ अभी और बड़ी होंगी, लेकिन यह बिंदु भारत को खेल में वापस रखने के लिए पर्याप्त हो सकता है।

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